अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
मूल पाठ
मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।
स्रोत अभिलेख 3.1 · पुस्तक पृ. 631, 633
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[हृदयमें प्रभुके दर्शन पाकर] मुनि बीच रास्तेमें अचल (स्थिर) होकर बैठ गये। उनका शरीर रोमाञ्चसे कटहलके फलके समान [कण्टकित] हो गया। तब श्रीरघुनाथजी उनके पास चले आये और अपने भक्तकी प्रेमदशा देखकर मनमें बहुत प्रसन्न हुए॥ ८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 632 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।।
English explanation
The sage sat motionless in the middle of the path; his body, bristling with horripilation, resembled a jackfruit.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि | the sage |
| मग | मार्ग के | of the path |
| माझ | बीच | middle |
| अचल | निश्चल | motionless |
| होइ | होकर | becoming |
| बैसा | बैठ गए | sat down |
| पुलक | रोमांचित | bristling with raised hairs |
| सरीर | शरीर | body |
| पनस | कटहल | jackfruit |
| फल | फल | fruit |
| जैसा | जैसा | like |
2 तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।।
English explanation
Then Rama came near; seeing his devotee’s state, he was pleased at heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| रघुनाथ | रघुकुल के स्वामी राम | Rama, lord of Raghu’s line |
| निकट | पास | near |
| चलि | चलकर | walking |
| आए | आए | came |
| देखि | देखकर | seeing |
| दसा | दशा | state |
| निज | अपने | his own |
| जन | भक्त की | devotee’s |
| मन | मन में | at heart |
| भाए | प्रसन्न हुए | was pleased |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 632
- सहायक विषय
- सुतीक्ष्णजीका प्रेम, अगस्त्य-मिलन, अगस्त्य-संवाद, रामका दण्डक-वन-प्रवेश और जटायु-मिलन
- मुद्रित पृष्ठ
- 631, 633
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।