अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दवेद जिनके विषयमें 'नेति-नेति कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यानमें नहीं पाते (अर्थात् जो मन और वाणीसे नितान्त परे हैं), वे ही श्रीरामजी मायासे बने हुए मृगके पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रकट हो जाता है और कभी छिप जाता है॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 656 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।
कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।
स्रोत अभिलेख 3.27 · पुस्तक पृ. 655, 656
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।।
English explanation
The very one whom the Vedas describe as ‘not this,’ and whom Shiva could not attain even in meditation, ran after the illusory deer.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निगम | वेद | the Vedas |
| नेति | यह नहीं | not this |
| सिव | शिव | Shiva |
| ध्यान | ध्यान में | in meditation |
| न | नहीं | not |
| पावा | पा सके | could attain |
| मायामृग | माया से बने मृग के | the illusory deer |
| पाछें | पीछे | after |
| सो | वही राम | that very Rama |
| धावा | दौड़े | ran |
2 कबहुँ निकट पुनि दूरि पराई। कबहुँक प्रगटइ कबहुँ छपाई।।
English explanation
The deer would sometimes come near, then flee far away; sometimes it appeared and sometimes it hid.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कबहुँ | कभी | sometimes |
| निकट | पास | near |
| पुनि | फिर | then |
| दूरि | दूर | far away |
| पराई | भाग जाता | fled |
| कबहुँक | कभी | sometimes |
| प्रगटइ | प्रकट होता | appeared |
| कबहुँ | कभी | sometimes |
| छपाई | छिप जाता | hid |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.27
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 656
- सहायक विषय
- मारीचप्रसंग और स्वर्ण-मृगरूपमें मारीचका मारा जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 655, 656
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।