अरण्यकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
मूल पाठ
जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
स्रोत अभिलेख 3.43 · पुस्तक पृ. 675, 676
भावार्थ
मूल पाठ के बादमेरे सेवकको केवल मेरा ही बल रहता है और उसे (ज्ञानीको) अपना बल होता है। पर काम-क्रोधरूपी शत्रु तो दोनोंके लिये हैं। [भक्तके शत्रुओंको मारनेकी जिम्मेवारी मुझपर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है; परन्तु अपने बलको माननेवाले ज्ञानीके शत्रुओंका नाश करनेकी जिम्मेवारी मुझपर नहीं है।] ऐसा विचारकर पण्डितजन (बुद्धिमान् लोग) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होनेपर भी भक्तिको नहीं छोड़ते॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 676 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।।
English explanation
The devotee relies on my strength, and the knowledgeable person on their own; desire and anger are enemies to both.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनहि | भक्त को | for the devotee |
| मोर | मेरा | my |
| बल | बल का सहारा | strength as support |
| निज | अपना | one’s own |
| बल | बल का सहारा | strength as support |
| ताही | उस ज्ञानी को | for that knowledgeable person |
| दुहु | दोनों | both |
| कहँ | के लिए | for |
| काम | कामना | desire |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| रिपु | शत्रु | enemies |
| आही | हैं | are |
2 यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।
English explanation
Considering this, the wise worship me and do not abandon devotion even after attaining knowledge.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| यह | यह बात | this |
| बिचारि | विचारकर | considering |
| पंडित | विवेकी लोग | wise people |
| मोहि | मुझे | me |
| भजहीं | भजते हैं | worship |
| पाएहुँ | प्राप्त कर लेने पर भी | even after attaining |
| ग्यान | आध्यात्मिक ज्ञान | spiritual knowledge |
| भगति | भक्ति | devotion |
| नहिं | नहीं | not |
| तजहीं | छोड़ते हैं | abandon |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- अरण्यकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 3.43
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 676
- सहायक विषय
- नारद-राम-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 675, 676
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।