उत्तरकाण्ड · दोहा 109 (क) · दोहा
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।
मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ १०९ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.109 · पुस्तक पृ. 1013, 1014
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि।
शिव के वचन सुनकर गुरु प्रसन्न हुए और ‘ऐसा ही हो’ कहा।
English explanation
Hearing Shiva’s words, the teacher rejoiced and said, “So be it.”
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सिव | भगवान शिव के | of Lord Shiva |
| बचन | वचन | words |
| हरषि | प्रसन्न होकर | having rejoiced |
| गुर | गुरु ने | the teacher |
| एवमस्तु | ऐसा ही हो | so be it |
| इति | ऐसा | thus |
| भाषि | कहकर | having said |
2मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि॥ १०९ (क)॥
मुझे समझाकर गुरु शिव के चरणों को हृदय में रखे हुए घर चले गए।
English explanation
After instructing me, the teacher went home, keeping Shiva’s feet in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझे | me |
| प्रबोधि | समझाकर | having instructed |
| गयउ | चले गए | went |
| गृह | घर | home |
| संभु | शिव के | of Shiva |
| चरन | चरण | feet |
| उर | हृदय में | in the heart |
| राखि | रखकर | having kept |
| क | दोहा-खंड का संदर्भ-चिह्न ‘क’ | reference marker for verse section ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 109 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.109
- सहायक विषय
- गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1013, 1014
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