उत्तरकाण्ड · दोहा 1 (क) · दोहा
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.1 · पुस्तक पृ. 906, 907
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत।
AI-प्रारूप: भरत का मन राम के विरह के सागर में डूब रहा था।
English explanation
AI draft: Bharata’s mind was sinking in the ocean of separation from Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम से | from Rama |
| बिरह | वियोग | separation |
| सागर | समुद्र | ocean |
| महँ | में | in |
| भरत | भरत का | Bharata’s, Rama’s brother’s |
| मगन | डूबा हुआ | submerged |
| मन | मन | mind |
| होत | हो रहा था | was becoming |
2बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत॥ १ (क)॥
ब्राह्मण का रूप धारण करके पवनपुत्र हनुमान ऐसे आ पहुँचे, मानो उस विरह-सागर में कोई जहाज़ आ गया हो।
English explanation
Assuming a Brahmin’s form, Hanuman, the wind god’s son, arrived like a ship upon that ocean of separation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिप्र | ब्राह्मण का | a Brahmin’s |
| रूप | वेश | form or guise |
| धरि | धारण करके | having assumed |
| पवनसुत | पवनपुत्र हनुमान | Hanuman, son of the wind god |
| आइ | आ | having come |
| गयउ | गए; आ पहुँचे | arrived |
| जनु | मानो | as though |
| पोत | जहाज़ | ship |
| क | पद्यांश का संदर्भ-चिह्न ‘क’ | verse-section reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 1 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.1
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 906, 907
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।