उत्तरकाण्ड · दोहा 117 (ग) · दोहा/सोरठा
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.117 · पुस्तक पृ. 1025, 1027
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि।
तीन अवस्थाओं और तीन गुणों रूपी उस कपास से रूई निकालकर।
English explanation
From that cotton of the three states and the three qualities, it extracts the fiber.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तीनि | तीन | three |
| अवस्था | चेतना की अवस्थाएँ | states of consciousness |
| तीनि | तीन | three |
| गुन | प्रकृति के गुण | qualities of nature |
| तेहि | उस | that |
| कपास | कपास | cotton |
| तें | से | from |
| काढ़ि | निकालकर | having extracted |
2 तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।।
फिर तुरीय अवस्था रूपी रूई सँवारकर उसकी सुगठित बाती बनाती है।
English explanation
Then it prepares the fiber of the fourth state and makes a firmly formed wick from it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तूल | रूई | cotton fiber |
| तुरीय | चौथी, तीन अवस्थाओं से परे अवस्था | the fourth state beyond the other three |
| सँवारि | सँवारकर | having prepared |
| पुनि | फिर | then |
| बाती | दीपक की बत्ती | lamp-wick |
| करै | बनाती है | makes |
| सुगाढ़ि | अच्छी तरह गठी हुई | firmly formed |
| ग | पद-संदर्भ चिह्न (ग) | verse reference marker (c) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 117 (ग)
- स्रोत अभिलेख
- 7.117
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1025, 1027
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