उत्तरकाण्ड · दोहा 117 (ख) · दोहा/सोरठा
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.117 · पुस्तक पृ. 1025, 1027
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ।
तब अनुभूत ज्ञानरूपिणी बुद्धि उस निर्मल घी को पाकर।
English explanation
Then the intellect, embodying realized knowledge, obtains that pure clarified butter.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| बिग्यानरूपिनि | अनुभूत ज्ञान का स्वरूप बनी | embodying realized knowledge |
| बुद्धि | बुद्धि | intellect |
| बिसद | निर्मल | pure |
| घृत | घी | clarified butter |
| पाइ | पाकर | having obtained |
2 चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।।
चित्तरूपी दीपक को उससे भरकर, दृढ़ समता की दीवट बनाकर उस पर रखती है।
English explanation
It fills the lamp of the mind with it and places it on a lampstand made of firm equanimity.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चित्त | चित्तरूपी | of the mind |
| दिआ | दीपक | lamp |
| भरि | भरकर | having filled |
| धरै | रखती है | places |
| दृढ़ | अटल | firm |
| समता | समभाव | equanimity |
| दिअटि | दीपक का आधार | lampstand |
| बनाइ | बनाकर | having made |
| ख | पद-संदर्भ चिह्न (ख) | verse reference marker (b) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 117 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.117
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1025, 1027
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