उत्तरकाण्ड · दोहा 118 (क) · दोहा
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस।
तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस।
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.118 · पुस्तक पृ. 1028, 1029
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तब फिरि जीव बिबिधि बिधि पावइ संसृति क्लेस।
तब जीव फिर अनेक प्रकार से जन्म-मरण के संसार का दुःख पाता है।
English explanation
Then the individual soul again suffers the afflictions of worldly existence in various ways.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| फिरि | फिर | again |
| जीव | जीवात्मा | the individual soul |
| बिबिधि | अनेक प्रकार की | various |
| बिधि | रीतियों से | in ways |
| पावइ | पाता है | experiences |
| संसृति | जन्म-मरण के संसार के | of worldly existence and rebirth |
| क्लेस | दुःख | afflictions |
2हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस॥ ११८ (क)॥
हे पक्षिराज गरुड़, हरि की माया अत्यंत दुस्तर है; उसे पार नहीं किया जा सकता।
English explanation
O Garuda, king of birds, Hari’s maya is exceedingly difficult to cross; it cannot be crossed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरि | भगवान हरि की | of Lord Hari |
| माया | माया | illusion-producing power |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| दुस्तर | पार करने में कठिन | difficult to cross |
| तरि | पार की | crossed |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकती | can be |
| बिहगेस | हे पक्षिराज गरुड़ | O Garuda, king of birds |
| क | पद का संदर्भ-चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 118 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.118
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1028, 1029
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