उत्तरकाण्ड · दोहा 10 (ख) · दोहा
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.1 · पुस्तक पृ. 917, 917
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ।
फिर उन्होंने जगह-जगह दूत भेजकर मंगल-कर्म की सामग्री मँगाई।
English explanation
Then he sent messengers to various places and had supplies for the auspicious rites brought.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जहँ | जहाँ | where |
| तहँ | तहाँ; वहाँ | there |
| धावन | दौड़कर संदेश पहुँचाने वाले दूत | swift messengers |
| पठइ | भेजकर | having sent |
| पुनि | फिर | then |
| मंगल | शुभ अनुष्ठान की | for auspicious rites |
| द्रब्य | सामग्री | supplies |
| मगाइ | मँगाई | had brought |
2हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ॥ १० (ख)॥
फिर सुमंत्र ने आकर हर्षपूर्वक वसिष्ठ के चरणों में सिर झुकाया।
English explanation
Then Sumantra returned and joyfully bowed his head at Vashishtha’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरष | हर्ष | joy |
| समेत | सहित | with |
| बसिष्ट | मुनि वसिष्ठ के | of sage Vashishtha |
| पद | चरणों में | at the feet |
| पुनि | फिर | then |
| सिरु | सिर | head |
| नायउ | झुकाया | bowed |
| आइ | आकर | having returned |
| ख | दोहा १० का संदर्भ-चिह्न (ख) | reference marker (b) for verse 10 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 10 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.1
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका स्वागत, भरत-मिलाप, सबका मिलनानन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 917, 917
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