उत्तरकाण्ड · दोहा 123 (क) · दोहा/सोरठा
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.123 · पुस्तक पृ. 1038, 1039
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
आज मैं धन्य हूँ, अत्यंत धन्य हूँ, यद्यपि हर प्रकार से हीन हूँ।
English explanation
Today I am blessed, truly blessed, although deficient in every way.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आजु | आज | today |
| धन्य | धन्य | blessed |
| मैं | मैं | I |
| धन्य | धन्य | blessed |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| जद्यपि | यद्यपि | although |
| सब | हर | every |
| बिधि | प्रकार से | in respect |
| हीन | हीन या कमी वाला | deficient |
2 निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।।
राम ने मुझे अपना सेवक जानकर संतों का संग दिया है।
English explanation
Recognizing me as his own servant, Rama granted me the company of saints.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपना | his own |
| जन | सेवक या भक्त | servant or devotee |
| जानि | जानकर | recognizing as |
| राम | भगवान राम ने | Lord Rama |
| मोहि | मुझे | to me |
| संत | संतों का | of saints |
| समागम | मिलन और संगति | meeting and company |
| दीन | दिया | granted |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 123 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.123
- सहायक विषय
- रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 1038, 1039
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।