उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।
मूल पाठ
देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।
स्रोत अभिलेख 7.69 · पुस्तक पृ. 972, 973
भावार्थ
मूल पाठ के बादबिलकुल ही लौकिक मनुष्योंका-सा चरित्र देखकर मेरे हृदयमें भारी सन्देह हो गया। मैं अब उस भ्रम (सन्देह) को अपने लिये हित करके समझता हूँ। कृपानिधानने मुझपर यह बड़ा अनुग्रह किया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 972 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 देखि चरित अति नर अनुसारी। भयउ हृदयँ मम संसय भारी।।
English explanation
AI draft: Seeing Rama’s conduct so closely resemble human behavior, a deep doubt arose in my heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | having seen |
| चरित | आचरण | conduct |
| अति | अत्यंत | very closely |
| नर | मनुष्य | human beings |
| अनुसारी | के अनुरूप | in keeping with |
| भयउ | उत्पन्न हुआ | arose |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| मम | मेरे | my |
| संसय | संदेह | doubt |
| भारी | गहरा | deep |
2 सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना। कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना।।
English explanation
I now regard that very bewilderment as beneficial to me; Rama, the treasure of compassion, bestowed grace on me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोइ | उसी | that very |
| भ्रम | भ्रम को | bewilderment |
| अब | अब | now |
| हित | हितकारी | beneficial |
| करि | के रूप में | as |
| मैं | मैंने | I |
| माना | माना है | have regarded |
| कीन्ह | किया | bestowed |
| अनुग्रह | अनुग्रह | grace |
| कृपानिधाना | कृपा के भंडार राम ने | Rama, the treasure of compassion |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.69
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 972
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 972, 973
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।