सुन्दरकाण्ड · दोहा 49 (क) · दोहा/सोरठा
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.49 · पुस्तक पृ. 758, 759
भावार्थ और शब्दार्थ
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1रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
रावण का क्रोध अग्नि था और उसकी अपनी साँस प्रचंड पवन थी।
English explanation
Ravana’s anger was a fire, and his own breath a fierce wind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रावन | रावण का | Ravana’s |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| अनल | अग्नि | fire |
| निज | अपनी | his own |
| स्वास | साँस | breath |
| समीर | पवन | wind |
| प्रचंड | प्रबल और उग्र | fierce and powerful |
2 जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
उसमें जलते हुए विभीषण को राम ने बचाया और उन्हें अखंड राज्य दिया।
English explanation
Rama saved Vibhishana, who was burning in that fire, and granted him an undivided kingdom.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जरत | जलते हुए | burning |
| बिभीषनु | विभीषण को | Vibhishana |
| राखेउ | बचाया | saved |
| दीन्हेहु | दिया | granted |
| राजु | राज्य | kingdom |
| अखंड | अविभाजित; अखंड | undivided; intact |
| क | दोहा 49 का संदर्भ-चिह्न (क) | reference marker (क) for verse 49 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 49 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 5.49
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 758, 759
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।