सुन्दरकाण्ड · दोहा 15 · दोहा/सोरठा
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.15 · पुस्तक पृ. 728, 728
भावार्थ और शब्दार्थ
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1निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
राक्षसों के समूह पतंगों के समान हैं और रघुपति राम के बाण अग्नि हैं।
English explanation
The hordes of demons are like moths, and Rama’s arrows are fire.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निसिचर | राक्षसों का | of demons |
| निकर | समूह | horde |
| पतंग | पतंगों; अग्नि की ओर उड़ने वाले कीटों | moths |
| सम | के समान | like |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी राम के | of Rama, lord of Raghu’s lineage |
| बान | बाण | arrows |
| कृसानु | अग्नि | fire |
2 जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।
हे माता, हृदय में धीरज रखिए; राक्षसों को जला हुआ ही समझिए।
English explanation
Mother, keep courage in your heart; regard the demons as already burned.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जननी | हे माता | O mother |
| हृदयँ | हृदय में | in your heart |
| धीर | धीरज | courage; composure |
| धरु | रखिए | keep |
| जरे | जले हुए | burned |
| निसाचर | राक्षसों को | the demons |
| जानु | समझिए; मानिए | consider; regard |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 15
- स्रोत अभिलेख
- 5.15
- सहायक विषय
- श्रीसीता-हनुमान्-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 728, 728
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