सुन्दरकाण्ड · दोहा 8 · दोहा/सोरठा
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.8 · पुस्तक पृ. 721, 722
भावार्थ और शब्दार्थ
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1निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
सीता की आँखें अपने चरणों पर टिकी थीं और मन राम के चरण-कमलों में लीन था।
English explanation
Sita’s eyes were fixed on her own feet, while her mind was absorbed in Rama’s lotus feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | her own |
| पद | चरणों पर | on her feet |
| नयन | आँखें | eyes |
| दिएँ | टिकाए हुए | having fixed |
| मन | मन | mind |
| राम | राम के | Rama’s |
| पद | चरण | feet |
| कमल | कमल; कमल जैसे | lotuses; lotus-like |
| लीन | मग्न; तल्लीन | absorbed |
2 परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।
जानकी को ऐसी दीन दशा में देखकर पवनपुत्र हनुमान अत्यंत दुखी हो गए।
English explanation
Seeing Sita in such a distressed condition, Hanuman, son of the wind-god, became deeply sorrowful.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परम | अत्यंत | extremely |
| दुखी | दुखी | sorrowful |
| भा | हो गए | became |
| पवनसुत | पवनपुत्र हनुमान | Hanuman, son of the wind-god |
| देखि | देखकर | on seeing |
| जानकी | सीता को; जनक की पुत्री को | Sita, Janaka’s daughter |
| दीन | दीन; दुख से व्याकुल | distressed; forlorn |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 8
- स्रोत अभिलेख
- 5.8
- सहायक विषय
- हनुमान्-विभीषण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 721, 722
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