सुन्दरकाण्ड · दोहा 33 · दोहा/सोरठा
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.33 · पुस्तक पृ. 743, 744
भावार्थ और शब्दार्थ
1 ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
हे प्रभु, जिस पर आप अनुकूल हों, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है।
English explanation
Lord, nothing is beyond reach for one toward whom you are favorable.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ता | उस व्यक्ति के | that person |
| कहुँ | लिए | for |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| कछु | कुछ भी | anything |
| अगम | अप्राप्य; असाध्य | unattainable; impossible |
| नहिं | नहीं | not |
| जा | जिस | whom |
| पर | पर | toward |
| तुम्ह | आप | you |
| अनुकुल | अनुकूल; कृपापूर्ण | favorable; gracious |
2 तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।
आपके प्रभाव से रूई भी निश्चय ही समुद्र की अग्नि को जला सकती है—यहाँ ‘तब’ को संभावित ‘तव’ के अर्थ में पढ़ने पर।
English explanation
Through your power, even cotton can indeed burn the submarine fire—if the supplied ‘तब’ is understood as a likely reading for ‘तव’ (your).
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | संभवतः आपका | probably your |
| प्रभावँ | प्रभाव से | through the power |
| बड़वानलहिं | समुद्र की अग्नि को | the submarine fire |
| जारि | जला | burn |
| सकइ | सकती है | can |
| खलु | निश्चय ही | indeed |
| तूल | रूई | cotton |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 33
- स्रोत अभिलेख
- 5.33
- सहायक विषय
- समुद्रके इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन-प्रवेश, सुग्रीव-मिलन, श्रीराम-हनुमान्-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 743, 744
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।