सुन्दरकाण्ड · दोहा 4 · दोहा/सोरठा
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.4 · पुस्तक पृ. 718, 718
भावार्थ और शब्दार्थ
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1तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
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2 तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 4
- स्रोत अभिलेख
- 5.4
- सहायक विषय
- लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 718, 718
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