सुन्दरकाण्ड · दोहा 12 · दोहा/सोरठा
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.12 · पुस्तक पृ. 724, 725
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
तब हनुमान ने मन में विचार करके मुद्रिका नीचे डाल दी।
English explanation
Then Hanuman considered the matter in his heart and dropped the ring down.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कपि | हनुमान | Hanuman, the monkey envoy |
| करि | करके | having made |
| हृदयँ | हृदय में | in his heart |
| बिचार | विचार | consideration |
| दीन्हि | दी | did |
| मुद्रिका | राम की अंगूठी | Rama’s signet ring |
| डारी | डाल | dropped |
| तब | तब | then |
2 जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।
मानो अशोक वृक्ष ने अंगारा दे दिया हो; सीता ने हर्षित होकर उठकर उसे हाथ में ले लिया।
English explanation
It was as though the ashoka tree had given her an ember; Sita rose joyfully and took it in her hand.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जनु | मानो | as though |
| असोक | अशोक वृक्ष ने | the ashoka tree |
| अंगार | अंगारा | an ember |
| दीन्हि | दे दिया | had given |
| हरषि | हर्षित होकर | joyfully |
| उठि | उठकर | having risen |
| कर | हाथ में | in her hand |
| गहेउ | सीता ने ले लिया | Sita took it |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 12
- स्रोत अभिलेख
- 5.12
- सहायक विषय
- श्रीसीता-त्रिजटा-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 724, 725
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