सुन्दरकाण्ड · दोहा 35 · दोहा/सोरठा
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 5.35 · पुस्तक पृ. 745, 746
भावार्थ और शब्दार्थ
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1एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
इस प्रकार यात्रा करके कृपा के भंडार राम समुद्र के तट पर आकर ठहरे।
English explanation
Traveling in this way, Rama, the treasure of compassion, came and camped on the seashore.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | way |
| जाइ | जाकर | having traveled |
| कृपानिधि | कृपा के भंडार राम | Rama, the treasure of compassion |
| उतरे | आकर ठहरे | arrived and camped |
| सागर | समुद्र के | of the sea |
| तीर | तट पर | on the shore |
2 जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।
बहुत-से भालू और वीर वानर जहाँ-तहाँ फल खाने लगे।
English explanation
The numerous bears and valiant monkeys began eating fruit here and there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जहँ | जहाँ | here |
| तहँ | तहाँ | and there |
| लागे | लगे | began |
| खान | खाने | to eat |
| फल | फल | fruit |
| भालु | भालू | bears |
| बिपुल | बहुत-से | numerous |
| कपि | वानर | monkeys |
| बीर | वीर | valiant |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 35
- स्रोत अभिलेख
- 5.35
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका वानरोंकी सेनाके साथ चलकर समुद्रतटपर पहुँचना
- मुद्रित पृष्ठ
- 745, 746
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