सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरामविमुख पुरुषकी सम्पत्ति और प्रभुता रही हुई भी चली जाती है और उसका पाना न पानेके समान है। जिन नदियोंके मूलमें कोई जलस्रोत नहीं है (अर्थात् जिन्हें केवल बरसातका ही आसरा है) वे वर्षा बीत जानेपर फिर तुरंत ही सूख जाती हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 735 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
स्रोत अभिलेख 5.23 · पुस्तक पृ. 735, 735
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
English explanation
The wealth and power of one turned away from Rama pass away—whether long possessed, newly acquired, or yet to be obtained.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम से | from Rama |
| बिमुख | विमुख व्यक्ति की | of one turned away |
| संपति | संपत्ति | wealth |
| प्रभुताई | प्रभुता, सत्ता | power, dominion |
| जाइ | चली जाती है | passes away |
| रही | पहले से बनी हुई | already possessed |
| पाई | प्राप्त हुई | acquired |
| बिनु | बिना | without |
| पाई | प्राप्त हुए | being acquired |
2 सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
English explanation
Rivers without a water-bearing source dry up again as soon as the rains have passed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सजल | जलयुक्त | water-bearing |
| मूल | स्रोत | source |
| जिन्ह | जिन | which |
| सरितन्ह | नदियों का | of the rivers |
| नाहीं | नहीं है | there is none |
| बरषि | वर्षा | the rains |
| गए | बीत जाने पर | having passed |
| पुनि | फिर | again |
| तबहिं | उसी समय, तुरंत | at once |
| सुखाहीं | सूख जाती हैं | dry up |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.23
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 735
- सहायक विषय
- हनुमान्-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 735, 735
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।