सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
मूल पाठ
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
स्रोत अभिलेख 5.47 · पुस्तक पृ. 756, 757
भावार्थ
मूल पाठ के बादमैं अत्यन्त नीच स्वभावका राक्षस हूँ। मैंने कभी शुभ आचरण नहीं किया। जिनका रूप मुनियोंके भी ध्यानमें नहीं आता, उन प्रभुने स्वयं हॢषत होकर मुझे हृदयसे लगा लिया॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 757 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
English explanation
I am a demon, exceedingly lowly in nature; I have never practiced good conduct.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मैं | मैं | I |
| निसिचर | राक्षस | a demon |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| अधम | नीच, अधम | base; lowly |
| सुभाऊ | स्वभाव वाला | in nature |
| सुभ | शुभ, अच्छा | good; virtuous |
| आचरनु | आचरण | conduct |
| कीन्ह | किया | performed |
| नहिं | नहीं | not |
| काऊ | कभी | ever |
2 जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
English explanation
The very Lord whose form does not appear even in sages’ meditation joyfully embraced me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिनका | whose |
| रूप | स्वरूप | form |
| मुनि | मुनियों के | of sages |
| ध्यान | ध्यान में | in meditation |
| न | नहीं | not |
| आवा | आता, प्रकट होता | appears |
| तेहिं | उन्हीं | that very |
| प्रभु | प्रभु ने | Lord |
| हरषि | प्रसन्न होकर | joyfully |
| हृदयँ | हृदय से | to his heart |
| मोहि | मुझे | me |
| लावा | लगा लिया | drew close; embraced |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.47
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 757
- सहायक विषय
- विभीषणका भगवान् श्रीरामजीकी शरणके लिये प्रस्थान और शरणप्राप्ति
- मुद्रित पृष्ठ
- 756, 757
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।