सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहनुमान्जी मच्छड़के समान (छोटा-सा) रूप धारण कर नररूपसे लीला करनेवाले भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करके लङ्काको चले। [लङ्काके द्वारपर] लङ्किनी नामकी एक राक्षसी रहती थी। वह बोली—मेरा निरादर करके (बिना मुझसे पूछे) कहाँ चला जा रहा है?॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 718 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
स्रोत अभिलेख 5.4 · पुस्तक पृ. 718, 718
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
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2 नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
इस पंक्ति का अर्थ अभी उपलब्ध नहीं है।
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 718
- सहायक विषय
- लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 718, 718
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