सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मूल पाठ
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
स्रोत अभिलेख 5.4 · पुस्तक पृ. 718, 718
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे मूर्ख! तूने मेरा भेद नहीं जाना? जहाँतक (जितने) चोर हैं, वे सब मेरे आहार हैं। महाकपि हनुमान्जीने उसे एक घूँसा मारा, जिससे वह खूनकी उलटी करती हुई पृथ्वीपर लुढ़क पड़ी॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 718 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
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2 मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 718
- सहायक विषय
- लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 718, 718
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