सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
मूल पाठ
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
स्रोत अभिलेख 5.4 · पुस्तक पृ. 718, 718
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह लङ्किनी फिर अपनेको सँभालकर उठी और डरके मारे हाथ जोड़कर विनती करने लगी। [वह बोली—] रावणको जब ब्रह्माजीने वर दिया था, तब चलते समय उन्होंने मुझे राक्षसोंके विनाशकी यह पहचान बता दी थी कि—॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 718 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
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2 जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.4
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 718
- सहायक विषय
- लङ्कावर्णन, लङ्किनीपर प्रहार, लङ्कामें प्रवेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 718, 718
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