सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
मूल पाठ
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
स्रोत अभिलेख 5.58 · पुस्तक पृ. 766, 767
भावार्थ
मूल पाठ के बादमगर, साँप तथा मछलियोंके समूह व्याकुल हो गये। जब समुद्रने जीवोंको जलते जाना, तब सोनेके थालमें अनेक मणियों (रत्नों) को भरकर अभिमान छोड़कर वह ब्राह्मणके रूपमें आया॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 767 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
English explanation
Crocodiles, serpents, and shoals of fish grew distressed. When the ocean realized that the creatures were burning—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मकर | मगर जैसे जलचर | crocodile-like aquatic creatures |
| उरग | सर्प | serpents |
| झष | मछलियाँ | fish |
| गन | समूह | groups |
| अकुलाने | व्याकुल हो गए | grew distressed |
| जरत | जलते हुए | burning |
| जंतु | जीवों को | the creatures |
| जलनिधि | समुद्र ने | the ocean |
| जब | जब | when |
| जाने | जाना | realized |
2 कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
English explanation
Then, abandoning his pride, he came in a Brahmin’s form with a golden platter filled with many kinds of gems.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कनक | सोने की | golden |
| थार | थाली | platter |
| भरि | भरकर | having filled |
| मनि | रत्न | gems |
| गन | समूह | collections |
| नाना | अनेक प्रकार के | of many kinds |
| बिप्र | ब्राह्मण के | of a Brahmin |
| रूप | रूप में | in the form |
| आयउ | आया | came |
| तजि | छोड़कर | abandoning |
| माना | अहंकार | pride |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.58
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 767
- सहायक विषय
- समुद्रपर श्रीरामजीका क्रोध और समुद्रकी विनती
- मुद्रित पृष्ठ
- 766, 767
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।