सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
मूल पाठ
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
स्रोत अभिलेख 5.8 · पुस्तक पृ. 721, 722
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो जानते हुए भी ऐसे स्वामी (श्रीरघुनाथजी) को भुलाकर [विषयोंके पीछे] भटकते फिरते हैं, वे दुखी क्यों न हों? इस प्रकार श्रीरामजीके गुणसमूहोंको कहते हुए उन्होंने अनिर्वचनीय (परम) शान्ति प्राप्त की॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 721 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
English explanation
Why would those who wander about forgetting such a master, even while knowing him, not suffer?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानतहूँ | जानते हुए भी | even while knowing |
| अस | ऐसे | such |
| स्वामि | स्वामी को; यहाँ राम को | the master; here, Rama |
| बिसारी | भुलाकर | having forgotten |
| फिरहिं | भटकते हैं | wander about |
| ते | वे लोग | those people |
| काहे | क्यों | why |
| न | नहीं | not |
| होहिं | हों | would be |
| दुखारी | दुखी | unhappy; suffering |
2 एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
English explanation
Speaking thus of Rama’s many virtues, Hanuman found indescribable peace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एहि | इस | this |
| बिधि | प्रकार | manner |
| कहत | कहते हुए | while recounting |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| गुन | गुण | virtues |
| ग्रामा | समूह; अनेक गुणों का संग्रह | multitude; collection |
| पावा | पाया | obtained |
| अनिर्बाच्य | जिसका वर्णन न हो सके | indescribable |
| बिश्रामा | शांति; मन का विश्राम | peace; repose of mind |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.8
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 721
- सहायक विषय
- हनुमान्-विभीषण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 721, 722
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