सुन्दरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
मूल पाठ
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
स्रोत अभिलेख 5.31 · पुस्तक पृ. 741, 742
भावार्थ
मूल पाठ के बाद[हाँ] एक दोष मैं अपना [अवश्य] मानती हूँ कि आपका वियोग होते ही मेरे प्राण नहीं चले गये। किन्तु हे नाथ! यह तो नेत्रोंका अपराध है जो प्राणोंके निकलनेमें हठपूर्वक बाधा देते हैं॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 742 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
English explanation
I acknowledge one fault of mine: when parted from you, my life did not depart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अवगुन | दोष | fault |
| एक | एक | one |
| मोर | मेरा | of mine |
| मैं | मैंने | I |
| माना | स्वीकार किया | acknowledge |
| बिछुरत | आपसे बिछुड़ते समय | on being parted from you |
| प्रान | प्राणों ने | my life-breath |
| न | नहीं | did not |
| कीन्ह | किया | make |
| पयाना | प्रस्थान | a departure |
2 नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
English explanation
My lord, that is the fault of my eyes: when my life-breath starts to leave, they stubbornly obstruct it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| सो | वह दोष | that fault |
| नयनन्हि | आँखों | the eyes |
| को | का | of |
| अपराधा | अपराध है | is the fault |
| निसरत | निकलते समय | when departing |
| प्रान | प्राण | life-breath |
| करिहिं | करती हैं | they cause |
| हठि | हठपूर्वक | stubbornly |
| बाधा | रुकावट | an obstruction |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- सुन्दरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 5.31
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 742
- सहायक विषय
- समुद्रके इस पार आना, सबका लौटना, मधुवन-प्रवेश, सुग्रीव-मिलन, श्रीराम-हनुमान्-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 741, 742
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।