लङ्काकाण्ड · दोहा 17 (ख) · दोहा/सोरठा
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.17 · पुस्तक पृ. 787, 788
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ।
हे स्वामी, सब काम स्वयं ही सिद्ध हैं; आपने मुझे सम्मान दिया है।
English explanation
O Lord, all tasks are already accomplished of themselves; you have bestowed honor upon me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| स्वयं | अपने आप | of themselves |
| सिद्ध | संपन्न हैं | are accomplished |
| सब | सभी | all |
| काज | काम | tasks |
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| मोहि | मुझे | to me |
| आदरु | सम्मान | honor |
| दियउ | दिया | bestowed |
2 अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
ऐसा विचारकर युवराज अंगद का शरीर रोमांचित और हृदय आनंदित हो गया।
English explanation
Thinking thus, Crown Prince Angada felt his body thrill and his heart fill with joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| बिचारि | विचारकर | having reflected |
| जुबराज | युवराज अंगद का | of Crown Prince Angada |
| तन | शरीर | body |
| पुलकित | रोमांचित | thrilled, with hairs standing on end |
| हरषित | आनंदित | joyful |
| हियउ | हृदय | heart |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न (ख) | verse reference marker (ख) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 17 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 6.17
- सहायक विषय
- मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 787, 788
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।