लङ्काकाण्ड · दोहा 28 · दोहा/सोरठा
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.28 · पुस्तक पृ. 798, 799
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस।
रावण के समान कौन वीर है, जिसने अपने हाथों से अपने सिर काटकर—
English explanation
What hero equals Ravana, who cut off his heads with his own hands—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सूर | वीर | hero |
| कवन | कौन | which |
| रावन | रावण | Ravana, king of Lanka |
| सरिस | के समान | equal to |
| स्वकर | अपने हाथों से | with his own hands |
| काटि | काटकर | having cut off |
| जेहिं | जिसने | who |
| सीस | सिर | heads |
2 हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।
अत्यंत हर्ष से अनेक बार उन्हें अग्नि में होम दिया; गौरी के स्वामी शिव इसके साक्षी हैं।
English explanation
He offered them into the fire many times with immense joy; Shiva, Gauri’s lord, is witness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हुने | होम दिए; आहुति दी | offered as oblations |
| अनल | अग्नि में | into fire |
| अति | अत्यंत | immense |
| हरष | हर्ष से | with joy |
| बहु | अनेक | many |
| बार | बार | times |
| साखि | साक्षी | witness |
| गौरीस | गौरी के स्वामी शिव | Shiva, Gauri’s lord |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 28
- स्रोत अभिलेख
- 6.28
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 798, 799
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