लङ्काकाण्ड · दोहा 45 · दोहा/सोरठा
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.45 · पुस्तक पृ. 816, 816
भावार्थ और शब्दार्थ
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1भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत।
अपनी भुजाओं के बल से शत्रु-सेना को रौंदकर और दिन का अंत देखकर—
English explanation
Having crushed the enemy army with the strength of their arms, and seeing the day draw to an end—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भुज | भुजाओं के | of their arms |
| बल | बल से | with the strength |
| रिपु | शत्रु की | enemy |
| दल | सेना | army |
| दलमलि | रौंदकर | having crushed |
| देखि | देखकर | seeing |
| दिवस | दिन | day |
| कर | का | of |
| अंत | अंत | end |
2 कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत।।45।।
दोनों बिना थकान के कूदकर वहाँ आ गए जहाँ भगवान राम थे।
English explanation
The two leapt back, free of fatigue, to where Lord Rama was.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कूदे | कूदे | leapt |
| जुगल | दोनों | the two |
| बिगत | रहित | free of |
| श्रम | थकान | fatigue |
| आए | आ गए | came |
| जहँ | जहाँ | where |
| भगवंत | भगवान राम थे | Lord Rama was |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 45
- स्रोत अभिलेख
- 6.45
- सहायक विषय
- युद्धारम्भ
- मुद्रित पृष्ठ
- 816, 816
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