लङ्काकाण्ड · दोहा 46 · दोहा/सोरठा
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.46 · पुस्तक पृ. 816, 817
भावार्थ और शब्दार्थ
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1देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार।
दसों दिशाओं में घना अँधेरा देखकर वानर दल भय से व्याकुल हो गया।
English explanation
Seeing dense darkness in all ten directions, the monkey army became alarmed and distraught.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| देखि | देखकर | seeing |
| निबिड़ | घना | dense |
| तम | अँधेरा | darkness |
| दसहुँ | सभी दस | all ten |
| दिसि | दिशाओं में | in the directions |
| कपिदल | वानरों की सेना | the monkey army |
| भयउ | हो गई | became |
| खभार | भयभीत और व्याकुल | alarmed and distraught |
2 एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार।।46।।
एक को दूसरा दिखाई नहीं देता था; वे जगह-जगह पुकार रहे थे।
English explanation
No one could see another; they called out everywhere.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एकहि | एक को | one another, as the object of seeing |
| एक | दूसरा कोई | another person |
| न | नहीं | not |
| देखई | देख पाता था | could see |
| जहँ | जहाँ | where |
| तहँ | वहाँ | there |
| करहिं | करते थे | were making |
| पुकार | पुकार | calls |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 46
- स्रोत अभिलेख
- 6.46
- सहायक विषय
- युद्धारम्भ
- मुद्रित पृष्ठ
- 816, 817
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