लङ्काकाण्ड · दोहा 111 · दोहा
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ १११॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.111 · पुस्तक पृ. 889, 891
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात।
एआई-प्रारूप अर्थ: चतुर्मुख ब्रह्मा ने विनय की; प्रेम से उनका शरीर अत्यंत रोमांचित था।
English explanation
AI-draft meaning: Four-faced Brahma offered his humble prayer, his body deeply thrilled with love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनय | विनयपूर्ण प्रार्थना | humble prayer |
| कीन्हि | की | offered |
| चतुरानन | चार मुखों वाले ब्रह्मा ने | four-faced Brahma |
| प्रेम | प्रेम से | with love |
| पुलक | रोमांचित | thrilled, with hair standing on end |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| गात | शरीर | body |
2सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात॥ १११॥
एआई-प्रारूप अर्थ: शोभा के सागर श्रीराम को देखते हुए ब्रह्मा के नेत्र तृप्त नहीं होते।
English explanation
AI-draft meaning: Gazing upon Rama, the ocean of beauty, Brahma’s eyes never have their fill.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सोभासिंधु | शोभा के सागर श्रीराम को | Rama, the ocean of beauty |
| बिलोकत | देखते हुए | while gazing upon |
| लोचन | नेत्र | eyes |
| नहीं | नहीं | not |
| अघात | तृप्त होते | have their fill |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 111
- स्रोत अभिलेख
- 6.111
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 889, 891
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