लङ्काकाण्ड · दोहा 110 · दोहा
करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥ ११०॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.11 · पुस्तक पृ. 888, 889
भावार्थ और शब्दार्थ
1करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि।
एआई-प्रारूप: विनती करके सभी देवता और सिद्ध जहाँ थे, वहीं हाथ जोड़े रहे।
English explanation
AI draft: Having offered their supplications, all the gods and perfected beings remained where they were, with folded hands.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having made |
| बिनती | विनती | supplication |
| सुर | देवता | gods |
| सिद्ध | सिद्ध पुरुष | spiritually perfected beings |
| सब | सभी | all |
| रहे | बने रहे | remained |
| जहँ | जहाँ | where |
| तहँ | वहीं | there |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | having folded |
2अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि॥ ११०॥
एआई-प्रारूप: अत्यंत प्रेम से, शरीर रोमांचित हुए, ब्रह्मा फिर स्तुति करने लगे।
English explanation
AI draft: Filled with deep love and with his body thrilled, Brahma began offering praise once again.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| सप्रेम | प्रेम सहित | with love |
| तन | शरीर | body |
| पुलकि | रोमांचित होकर | thrilled, with hair standing on end |
| बिधि | ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता | Brahma, the creator |
| अस्तुति | स्तुति | praise |
| करत | करने लगे | began offering |
| बहोरि | फिर | again |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 110
- स्रोत अभिलेख
- 6.11
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 888, 889
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।