लङ्काकाण्ड · दोहा 61 · दोहा/सोरठा
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।61।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.61 · पुस्तक पृ. 829, 831
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर।
प्रभु का विलाप कानों से सुनकर वानरों के समूह व्याकुल हो गए।
English explanation
Hearing the Lord’s lament with their own ears, the groups of monkeys became distraught.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम का | Lord Rama’s |
| प्रलाप | विलाप | lament |
| सुनि | सुनकर | hearing |
| कान | कानों से | with their ears |
| बिकल | व्याकुल | distraught |
| भए | हो गए | became |
| बानर | वानरों के | of monkeys |
| निकर | समूह | groups |
2 आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस।।61।।
हनुमान आ पहुँचे, जैसे करुण रस के बीच वीर रस प्रकट हो गया हो।
English explanation
Hanuman arrived, as though the heroic sentiment had appeared amid the sentiment of pathos.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| आइ | आकर | coming |
| गयउ | पहुँच गए | arrived |
| हनुमान | रामभक्त हनुमान | Hanuman, Rama’s devotee |
| जिमि | जैसे | as though |
| करुना | करुण रस | the sentiment of pathos |
| महँ | में | amid |
| बीर | वीरता का | heroic |
| रस | रस | aesthetic sentiment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 61
- स्रोत अभिलेख
- 6.61
- सहायक विषय
- श्रीरामजीकी प्रलापलीला, हनुमान्जीका लौटना, लक्ष्मणजीका उठ बैठना
- मुद्रित पृष्ठ
- 829, 831
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