लङ्काकाण्ड · दोहा 60 (ख) · दोहा/सोरठा
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।60(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.6 · पुस्तक पृ. 829, 829
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
भरत के भुजबल, शील, गुण और प्रभु के चरणों में उनकी अपार प्रीति को—
English explanation
Bharata’s strength of arm, noble character, virtues, and boundless love for the Lord’s feet—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भरत | श्रीराम के भाई भरत के | of Bharata, Rama’s brother |
| बाहु | भुजाओं का | of his arms |
| बल | बल | strength |
| सील | शील | noble character |
| गुन | गुण | virtues |
| प्रभु | प्रभु श्रीराम के | of Lord Rama |
| पद | चरणों में | at the feet |
| प्रीति | प्रेम | love |
| अपार | असीम | boundless |
2 मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार।।60(ख)।।
जाते हुए पवनपुत्र हनुमान मन में बार-बार सराहते रहे।
English explanation
As he went, Hanuman, the son of the wind god, repeatedly praised these qualities in his mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मन | मन | mind |
| महुँ | में | in |
| जात | जाते हुए | while going |
| सराहत | सराहते हुए | praising |
| पुनि | बार | again |
| पुनि | बार | again |
| पवनकुमार | पवनपुत्र हनुमान | Hanuman, son of the wind god |
| ख | दोहा 60 का संदर्भ-चिह्न (ख) | reference marker (ख) for verse 60 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 60 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 6.6
- सहायक विषय
- श्रीरामजीकी प्रलापलीला, हनुमान्जीका लौटना, लक्ष्मणजीका उठ बैठना
- मुद्रित पृष्ठ
- 829, 829
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