लङ्काकाण्ड · दोहा 106 · दोहा
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥ १०६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.106 · पुस्तक पृ. 883, 884
भावार्थ और शब्दार्थ
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1प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज।
प्रभु के वचन कानों से सुनकर वानरों के समूह तृप्त नहीं होते।
English explanation
Hearing the Lord’s words, the bands of monkeys cannot hear enough of them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| के | के | of |
| बचन | वचन | words |
| श्रवन | कानों से | with their ears |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| नहिं | नहीं | not |
| अघाहिं | तृप्त होते; जी भरता है | are satisfied; have their fill |
| कपि | वानरों के | of monkeys |
| पुंज | समूह | bands; groups |
2बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज॥ १०६॥
सभी बार-बार सिर झुकाते हैं और प्रभु के कमल-समान चरण पकड़ते हैं।
English explanation
All repeatedly bow their heads and clasp the Lord’s lotus-like feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बार | बार; अवसर | time; occasion |
| बार | बार; पुनः | time; again |
| सिर | सिर | their heads |
| नावहिं | झुकाते हैं | bow |
| गहहिं | पकड़ते हैं | clasp |
| सकल | सभी वानर | all the monkeys |
| पद | प्रभु के चरण | the Lord’s feet |
| कंज | कमल; कमल-समान | lotuses; lotus-like |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 106
- स्रोत अभिलेख
- 6.106
- सहायक विषय
- मन्दोदरी-विलाप, रावणकी अन्त्येष्टि-क्रिया
- मुद्रित पृष्ठ
- 883, 884
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