लङ्काकाण्ड · दोहा 114 (ख) · दोहा
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.114 · पुस्तक पृ. 894, 894
भावार्थ और शब्दार्थ
1परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि।
अत्यंत प्रेम से दोनों हाथ जोड़कर और कमल-समान नेत्रों में आँसू भरकर—
English explanation
With deepest love, joining both hands and filling his lotus-like eyes with tears—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परम | अत्यंत | deepest |
| प्रीति | प्रेम से | with love |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | having joined |
| जुग | दोनों; जोड़ी | both; a pair |
| नलिन | कमल-समान | lotus-like |
| नयन | नेत्रों में | in his eyes |
| भरि | भरकर | having filled |
| बारि | आँसू | tears |
2पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि॥ ११४ (ख)॥
रोमांचित शरीर और भाव से गद्गद वाणी के साथ त्रिपुरासुर-विनाशक शिव विनय कर रहे हैं।
English explanation
With his body thrilled and his voice choked with emotion, Shiva, destroyer of Tripura, offers a humble supplication.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुलकित | रोमांचित; रोंगटे खड़े हुए | thrilled, with hair standing on end |
| तन | शरीर | body |
| गदगद | भाव से अवरुद्ध | choked with emotion |
| गिराँ | वाणी | voice |
| बिनय | विनम्र प्रार्थना | humble supplication |
| करत | कर रहे हैं | is offering |
| त्रिपुरारि | त्रिपुर के विनाशक शिव | Shiva, destroyer of Tripura |
| ख | दोहा ११४ के दूसरे भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the second part of verse 114 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 114 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 6.114
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 894, 894
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।