लङ्काकाण्ड · दोहा 115 · दोहा
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।
कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.115 · पुस्तक पृ. 895, 895
भावार्थ और शब्दार्थ
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1नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार।
हे नाथ, जब कोसलपुरी अयोध्या में आपका राज्याभिषेक होगा—
English explanation
O Lord, when your coronation takes place in Ayodhya, the city of Kosala—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O Lord |
| जबहिं | जब ही; जब | when |
| कोसलपुरीं | कोसलपुरी अयोध्या में | in Ayodhya, the city of Kosala |
| होइहि | होगा | will take place |
| तिलक | राज्याभिषेक | coronation |
| तुम्हार | आपका | your |
2कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार॥ ११५॥
हे कृपा के सागर, मैं उस उदात्त चरित को देखने आऊँगा।
English explanation
O ocean of compassion, I will come to witness that noble event.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कृपासिंधु | हे कृपा के सागर | O ocean of compassion |
| मैं | मैं | I |
| आउब | आऊँगा | will come |
| देखन | देखने के लिए | to witness |
| चरित | चरित; राज्याभिषेक का प्रसंग | event; the coronation |
| उदार | उदात्त; महान | noble; glorious |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 115
- स्रोत अभिलेख
- 6.115
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 895, 895
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