लङ्काकाण्ड · दोहा 92 · दोहा
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.92 · पुस्तक पृ. 865, 866
भावार्थ और शब्दार्थ
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1जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार।
जैसे-जैसे प्रभु राम रावण के सिर काटते हैं, वैसे-वैसे वे असंख्य होते जाते हैं।
English explanation
As Lord Rama cuts off Ravana’s heads, they become ever more numerous.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | as |
| जिमि | जैसे | progressively |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| हर | काटते हैं | cut off |
| तासु | उस रावण के | of that Ravana |
| सिर | सिर | heads |
| तिमि | वैसे | so |
| तिमि | वैसे | correspondingly |
| होहिं | होते जाते हैं | become |
| अपार | असंख्य | countless |
2सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार॥ ९२॥
जैसे विषयों का सेवन करने से कामवासना नित्य नई होकर बढ़ती जाती है।
English explanation
Just as indulging in sense pleasures makes desire grow, renewed day after day.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सेवत | सेवन करने पर | when indulging in |
| बिषय | इंद्रिय-विषयों का | sense pleasures |
| बिबर्ध | बढ़ती है | increases |
| जिमि | जैसे | just as |
| नित | नित्य | day |
| नित | नित्य | after day |
| नूतन | नई | renewed |
| मार | कामवासना | sensual desire |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा 92
- स्रोत अभिलेख
- 6.92
- सहायक विषय
- इन्द्रका श्रीरामजीके लिये रथ भेजना, राम-रावण-युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 865, 866
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।