लङ्काकाण्ड · दोहा 15 (ख) · दोहा/सोरठा
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।
अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।
प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 6.15 · पुस्तक पृ. 785, 786
भावार्थ और शब्दार्थ
1अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ।
हे प्राणप्रिय पति, ऐसा विचार करके सुनिए और प्रभु से वैर छोड़ दीजिए।
English explanation
Beloved husband, consider this and listen; abandon hostility toward the Lord.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus; this |
| बिचारि | विचार करके | having considered |
| सुनु | सुनिए | listen |
| प्रानपति | हे प्राणप्रिय पति | O dearly beloved husband |
| प्रभु | प्रभु; यहाँ राम | the Lord; here, Rama |
| सन | से; के साथ | with; toward |
| बयरु | वैर; शत्रुता | enmity; hostility |
| बिहाइ | छोड़कर | abandoning |
2प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15(ख)।।
रघुवीर के चरणों से प्रेम कीजिए, ताकि मेरा सौभाग्य—पति का जीवित रहना—न छिन जाए।
English explanation
Love the feet of Rama, the hero of Raghu’s lineage, so that I do not lose the blessing of having my husband alive.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रीति | प्रेम | love |
| करहु | कीजिए | practice; have |
| रघुबीर | रघुवंश के वीर राम | Rama, hero of Raghu’s lineage |
| पद | चरणों में | at his feet |
| मम | मेरा | my |
| अहिवात | सुहाग; पति के जीवित होने का सौभाग्य | the blessing of having a living husband |
| न | नहीं | not |
| जाइ | चला जाए; नष्ट हो | be lost; perish |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न (ख) | verse reference marker (b) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 15 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 6.15
- सहायक विषय
- मन्दोदरीका फिर रावणको समझाना और श्रीरामकी महिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 785, 786
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।