लङ्काकाण्ड · छंद · छंद
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दविषयकामनाओंके समूहरूपी कमलवनके [नाशके] लिये आप प्रबल पाला हैं, आप उदार और मनसे परे हैं। भवसागर [को मथने] के लिये आप मन्दराचल पर्वत हैं। आप हमारे परम भयको दूर कीजिये और हमें दुस्तर संसारसागरसे पार कीजिये॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 895 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन।।
भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर।।3।।
स्रोत अभिलेख 6.115 · पुस्तक पृ. 895, 895
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन।।
English explanation
You are a severe frost to the lotus grove of accumulated desires for sense pleasures, and you are generous; the closing phrase ‘पार मन’ is uncertain in the supplied text.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिषय | इंद्रिय-विषयों के | for sense pleasures |
| मनोरथ | मन की इच्छाएँ | desires |
| पुंज | समूह | aggregate |
| कंज | कमल | lotuses |
| बन | वन | grove |
| प्रबल | तीव्र | severe |
| तुषार | पाला | frost |
| उदार | उदार | generous |
| पार | परे; मन की पहुँच से परे। | Beyond; beyond the mind’s reach. |
| मन | मन; मानसिक विचार और समझ की शक्ति। | The mind; the faculty of thought and comprehension. |
2 भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर।।3।।
English explanation
You are Mount Mandara for the ocean of worldly existence. Remove the greatest fear and carry me across this hard-to-cross cycle of existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भव | संसार रूपी | of worldly existence |
| बारिधि | समुद्र | ocean |
| मंदर | मंदर पर्वत | Mount Mandara, the churning mountain |
| परमं | परम, अत्यंत बड़ा | greatest |
| दर | भय | fear |
| बारय | दूर कीजिए | ward off |
| तारय | पार उतारिए | carry across |
| संसृति | जन्म-मरण का संसार | the cycle of worldly existence |
| दुस्तर | जिसे पार करना कठिन है | hard to cross |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 6.115
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 895
- सहायक विषय
- देवताओंकी स्तुति, इन्द्रकी अमृत-वर्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 895, 895
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।