लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मूल पाठ
होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।
स्रोत अभिलेख 6.3 · पुस्तक पृ. 774, 775
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो छल छोड़कर और निष्काम होकर श्रीरामेश्वरजीकी सेवा करेंगे, उन्हें शङ्करजी मेरी भक्ति देंगे। और जो मेरे बनाये सेतुका दर्शन करेगा, वह बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जायगा॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 774 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 होइ अकाम जो छल तजि सेइहि। भगति मोरि तेहि संकर देइहि।।
English explanation
To whoever serves Rameshwar without selfish desire and with deceit abandoned, Shiva will grant devotion to me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होइ | होकर | being |
| अकाम | स्वार्थपूर्ण कामनाओं से रहित | free of selfish desire |
| जो | जो व्यक्ति | whoever |
| छल | कपट | deceit |
| तजि | छोड़कर | having abandoned |
| सेइहि | सेवा-पूजा करेगा | will serve and worship |
| भगति | भक्ति | devotion |
| मोरि | मेरी, अर्थात राम की | to me, Rama |
| तेहि | उसको | to that person |
| संकर | शंकर, शिव | Shiva |
| देइहि | देंगे | will give |
2 मम कृत सेतु जो दरसनु करिही। सो बिनु श्रम भवसागर तरिही।।
English explanation
Whoever beholds the bridge made by me will cross the ocean of worldly existence without toil.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मम | मेरे द्वारा | by me |
| कृत | निर्मित | made |
| सेतु | पुल के | of the bridge |
| जो | जो व्यक्ति | whoever |
| दरसनु | दर्शन | sacred viewing |
| करिही | करेगा | will perform |
| सो | वह | that person |
| बिनु | बिना | without |
| श्रम | परिश्रम | toil |
| भवसागर | संसाररूपी सागर | the ocean of worldly existence |
| तरिही | पार करेगा | will cross |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.3
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 774
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 774, 775
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