लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
मूल पाठ
सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
स्रोत अभिलेख 6.36 · पुस्तक पृ. 807, 808
भावार्थ
मूल पाठ के बादशूर्पणखाकी दशा तो आपने देख ही ली। तो भी आपके हृदयमें [उनसे लडऩेकी बात सोचते] विशेष (कुछ भी) लज्जा नहीं आती!॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 808 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
English explanation
You saw what happened to Shurpanakha, yet felt no great shame in your heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सूपनखा | शूर्पणखा, रावण की बहन | Shurpanakha, Ravana’s sister |
| कै | की | of |
| गति | दशा, दुर्दशा | plight |
| तुम्ह | तुमने | you |
| देखी | देखी | saw |
| तदपि | फिर भी | yet |
| हृदयँ | हृदय में | in your heart |
| नहिं | नहीं | not |
| लाज | लज्जा | shame |
| बिषेषी | विशेष, अधिक | great, considerable |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.36
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 808
- सहायक विषय
- रावणको पुन: मन्दोदरीका समझाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 807, 808
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।