लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी।।
मूल पाठ
सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी।।
लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ।।
स्रोत अभिलेख 6.109 · पुस्तक पृ. 887, 887
भावार्थ
मूल पाठ के बादश्रीसीताजीकी विरह, विवेक, धर्म और नीतिसे सनी हुई वाणी सुनकर लक्ष्मणजीके नेत्रोंमें [विषादके आँसुओंका] जल भर आया। वे दोनों हाथ जोड़े खड़े रहे। वे भी प्रभुसे कुछ कह नहीं सकते॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 887 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी।।
English explanation
Lakshmana heard Sita’s words, steeped in the anguish of separation, discernment, righteousness, and propriety.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| लछिमन | लक्ष्मण | Lakshmana, Rama’s younger brother |
| सीता | सीता | Sita |
| कै | की | of |
| बानी | वाणी | words |
| बिरह | विरह की पीड़ा | anguish of separation |
| बिबेक | विवेक | discernment |
| धरम | धर्म | righteousness |
| निति | नीति; उचित आचरण | propriety; right conduct |
| सानी | सनी हुई | steeped in |
2 लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ।।
English explanation
With tear-filled eyes and both hands joined, he too could say nothing to Lord Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लोचन | आँखें | eyes |
| सजल | आँसुओं से भरी | filled with tears |
| जोरि | जोड़कर | joining |
| कर | हाथ | hands |
| दोऊ | दोनों | both |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| सन | से | to |
| कछु | कुछ | anything |
| कहि | कह | say |
| सकत | सकते | could |
| न | नहीं | not |
| ओऊ | वे भी, अर्थात लक्ष्मण भी | he too, namely Lakshmana |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.109
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 887
- सहायक विषय
- हनुमान्जीका सीताजीको कुशल सुनाना, सीताजीका आगमन और अग्नि-परीक्षा
- मुद्रित पृष्ठ
- 887, 887
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।