लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।
मूल पाठ
सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
स्रोत अभिलेख 6.2 · पुस्तक पृ. 773, 774
भावार्थ
मूल पाठ के बादजो शिवसे द्रोह रखता है और मेरा भक्त कहलाता है, वह मनुष्य स्वप्रमें भी मुझे नहीं पाता। शङ्करजीसे विमुख होकर (विरोध करके) जो मेरी भक्ति चाहता है, वह नरकगामी, मूर्ख और अल्पबुद्धि है॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 774 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा।।
English explanation
Anyone who is hostile to Shiva yet calls himself my devotee does not attain me even in a dream.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिव | शिव के | toward Shiva |
| द्रोही | द्वेष करने वाला | one who bears hostility |
| मम | मेरा | my |
| भगत | भक्त | devotee |
| कहावा | कहलाता है | calls himself |
| सो | वह | that |
| नर | मनुष्य | person |
| सपनेहुँ | स्वप्न में भी | even in a dream |
| मोहि | मुझे | me |
| न | नहीं | not |
| पावा | पाता है | attains |
2 संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी।।
English explanation
Anyone who turns away from Shiva yet desires devotion to me is destined for hell, foolish, and of little understanding.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संकर | शंकर अर्थात् शिव से | from Shiva |
| बिमुख | विमुख | turned away |
| भगति | भक्ति | devotion |
| चह | चाहता है | desires |
| मोरी | मेरी | to me |
| सो | वह | that person |
| नारकी | नरक का भागी | destined for hell |
| मूढ़ | मूर्ख | foolish |
| मति | बुद्धि | understanding |
| थोरी | थोड़ी | little |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.2
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 774
- सहायक विषय
- नल-नीलद्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजीद्वारा श्रीरामेश्वरकी स्थापना
- मुद्रित पृष्ठ
- 773, 774
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।