लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।
मूल पाठ
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।
भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।।
स्रोत अभिलेख 6.25 · पुस्तक पृ. 796, 796
भावार्थ
मूल पाठ के बादसिररूपी कमलोंको अपने हाथोंसे उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजीकी पूजा की है। अरे मूर्ख! मेरी भुजाओंका पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदयमें वह आज भी चुभ रहा है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 796 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।।
English explanation
Severing my own lotus-like heads with my own hands, I worshipped Shiva, destroyer of Tripura, countless times.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सिर | सिर | heads |
| सरोज | कमल; यहाँ कमल-समान | lotuses; here, lotus-like |
| निज | अपने ही | my own |
| करन्हि | हाथों से | with my hands |
| उतारी | काटकर उतारकर | having severed |
| पूजेउँ | मैंने पूजा की | I worshipped |
| अमित | अनगिनत | countless |
| बार | बार | times |
| त्रिपुरारी | त्रिपुर का विनाश करने वाले शिव | Shiva, destroyer of Tripura |
2 भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।।
English explanation
The guardians of the directions know the prowess of my arms; fool, its pain still lodges in their hearts.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भुज | भुजाओं का | of my arms |
| बिक्रम | पराक्रम | prowess |
| जानहिं | जानते हैं | know |
| दिगपाला | दिशाओं के रक्षक देवता | guardian deities of the directions |
| सठ | हे मूर्ख | O fool |
| अजहूँ | अब भी | even now |
| जिन्ह | जिनके | whose |
| कें | के | of |
| उर | हृदय में | in the hearts |
| साला | चुभन या पीड़ा | piercing pain |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.25
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 796
- सहायक विषय
- अंगदजीका लंका जाना और रावणकी सभामें अंगद-रावण-संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 796, 796
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।