लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।
मूल पाठ
सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।
स्रोत अभिलेख 6.8 · पुस्तक पृ. 850, 851
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे सखे! ऐसा धर्ममय रथ जिसके हो उसके लिये जीतनेको कहीं शत्रु ही नहीं है॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 851 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।
English explanation
Friend, whoever possesses such a chariot of righteousness has no enemy anywhere capable of defeating him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सखा | हे मित्र | O friend |
| धर्ममय | धर्म से बना; धर्मपूर्ण | made of righteousness |
| अस | ऐसा | such |
| रथ | रथ | chariot |
| जाकें | जिसके पास | whoever has |
| जीतन | जीतने | to defeat |
| कहँ | के लिए | for; in order to |
| न | नहीं | no; not |
| कतहुँ | कहीं भी | anywhere |
| रिपु | शत्रु | enemy |
| ताकें | उसके; उसे | his; him |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.8
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 851
- सहायक विषय
- रावणका युद्धके लिये प्रस्थान और श्रीरामजीका विजय-रथ तथा वानर-राक्षसोंका युद्ध
- मुद्रित पृष्ठ
- 850, 851
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।