लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।
मूल पाठ
लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।
स्रोत अभिलेख 6.72 · पुस्तक पृ. 841, 842
भावार्थ
मूल पाठ के बाददोनों ओरके योद्धा अपनी-अपनी जयके लिये लड़ रहे हैं। हे गरुड़! उनके युद्धका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 842 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।
English explanation
The warriors fight for their respective sides’ victory. O Garuda, that battle cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लरहिं | लड़ते हैं | fight |
| सुभट | वीर योद्धा | valiant warriors |
| निज | अपने | their own |
| निज | अपने | respective |
| जय | विजय | victory |
| हेतू | के लिए | for the sake of |
| बरनि | वर्णन किया | described |
| न | नहीं | not |
| जाइ | जा सकता | can be |
| समर | युद्ध | the battle |
| खगकेतू | हे पक्षियों के ध्वजस्वरूप गरुड़ | O Garuda, foremost among birds |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.72
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 842
- सहायक विषय
- कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति
- मुद्रित पृष्ठ
- 841, 842
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।