लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दरणके मदमें मत्त राक्षस कुम्भकर्ण इस प्रकार गॢवत हुआ, मानो विधाताने उसको सारा विश्व अर्पण कर दिया हो, और उसे वह ग्रास कर जायगा। सब योद्धा भाग खड़े हुए, वे लौटाये भी नहीं लौटते। आँखोंसे उन्हें सूझ नहीं पड़ता और पुकारनेसे सुनते नहीं!॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 836 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।
मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे।।
स्रोत अभिलेख 6.67 · पुस्तक पृ. 836, 837
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 रन मद मत्त निसाचर दर्पा। बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा।।
English explanation
Intoxicated with battle-frenzy, the demon rushed forward arrogantly, as though he would devour the whole world in this manner.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रन | युद्ध का | of battle |
| मद | मद; उन्माद | intoxication; frenzy |
| मत्त | मतवाला | intoxicated |
| निसाचर | राक्षस कुंभकर्ण | the demon Kumbhakarna |
| दर्पा | दर्प किया; अकड़ा | swaggered arrogantly |
| बिस्व | संसार को | the world |
| ग्रसिहि | निगल जाएगा | will devour |
| जनु | मानो | as though |
| एहि | इस | this |
| बिधि | रीति से | in this manner |
| अर्पा | झपटा; धावा किया | rushed forward; charged |
2 मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे। सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे।।
English explanation
All the brave warriors turned and fled; even when urged back, they would not return. Their eyes discerned nothing, and they did not hear the calls.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुरे | पीछे मुड़े; भाग चले | turned back; fled |
| सुभट | वीर योद्धा | valiant warriors |
| सब | सभी | all |
| फिरहिं | लौटते हैं | return |
| न | नहीं | not |
| फेरे | लौटाए जाने पर भी | even when urged to turn back |
| सूझ | दिखाई देता; समझ पड़ता | is discernible |
| न | नहीं | not |
| नयन | आँखों को | to their eyes |
| सुनहिं | सुनते हैं | hear |
| नहिं | नहीं | not |
| टेरे | पुकारें | calls |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.67
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 836
- सहायक विषय
- कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति
- मुद्रित पृष्ठ
- 836, 837
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।