लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्द[वे कहने लगे—] यह राक्षस दुॢभक्षके समान है, जो अब वानरकुलरूपी देशमें पडऩा चाहता है। हे कृपारूपी जलके धारण करनेवाले मेघरूप श्रीराम! हे खरके शत्रु! हे शरणागतके दु:ख हरनेवाले! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 838 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।
कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।।
स्रोत अभिलेख 6.7 · पुस्तक पृ. 838, 839
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।।
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2 कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।।
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स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.7
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 838
- सहायक विषय
- कुम्भकर्ण-युद्ध और उसकी परमगति
- मुद्रित पृष्ठ
- 838, 839
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।