लङ्काकाण्ड · चौपाई · चौपाई
बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्ददेवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं—कृपालुकी जय हो, मुकुन्दकी जय हो, जय हो!॥ ६॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 880 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
स्रोत अभिलेख 6.103 · पुस्तक पृ. 879, 880
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।
English explanation
Hosts of gods and sages shower flowers: ‘Glory to the compassionate Lord! Victory! Glory to Mukunda, the giver of liberation!’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरषहि | बरसाते हैं | shower |
| सुमन | फूल | flowers |
| देव | देवताओं के | of gods |
| मुनि | मुनियों के | of sages |
| बृंदा | समूह | hosts |
| जय | जय हो | glory to |
| कृपाल | कृपालु प्रभु | the compassionate Lord |
| जय | जय हो | victory |
| जयति | जय हो; विजयी हों | may he be victorious |
| मुकुंदा | मुक्तिदाता प्रभु; यहाँ राम | the giver of liberation, here Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- लङ्काकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 6.103
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 880
- सहायक विषय
- राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि
- मुद्रित पृष्ठ
- 879, 880
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।